BLOG: बढ़ती मंहगाई से जनमानस त्रस्त, लेकिन सरकार अपने हाल में मस्त - गुना समाचार

BLOG: बढ़ती मंहगाई से जनमानस त्रस्त, लेकिन सरकार अपने हाल में मस्त


दूध महंगा, पेट्रोल डीजल महंगा, रसोई गैस महंगी, शिक्षा महंगी, रेस्टोरेंट में खाना महंगा, रेलवे प्लेटफार्म का टिकट महंगा, यात्रा करना महंगा, फल, फूल, खाद्य सामग्री आदि सब कुछ महंगा हो गया है। ऐसी कौन सी चीज है, जिस पर कीमतें ना बढ़ी हों। ऐसा तो बिलकुल भी नहीं है कि बदलाव या विकास का सिलसिला बीते आठ सालों में ही शुरू हुआ है। देश की आजादी से लेकर आज तक हम लगातार सफलता के कीर्तिमान रच रहे हैं, ऐसे में ये कहना कि देश पिछले सत्तर सालों से पिछड़ रहा है अथवा समाज में बदलाव तथा सुविधाएं उपलब्ध करने के लिए तत्कालीन सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाए, इसे हास्यास्पद ही कहा जाएगा।

देश में जिस तरह से महंगाई आसमान छू रही है वो किसी से छुपी नहीं है। बढ़ती कीमतों ने लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। महंगाई की सबसे ज्यादा मार गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों पर पड़ रही है, बावजूद इसके सरकार की ओर बढ़ती मंहगाई पर काबू पाने के लिए कोई भी उचित कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। व्यावसायिक सिलेंडरों में कीमतों बढ़ने के कारण रेस्टोरेंट तथा खान पान की छोटी छोटी दुकानें चलाने वाले लोगों के सामने बहुत बड़ी समस्या पैदा हो गई है। जनता को अच्छे दिन आने का शिगूफा छोड़ते हुए कहा कि रोजगार के अवसर पैदा होंगे, महंगाई से राहत मिलेगी, शिक्षा का स्तर सुधरेगा, गरीबी मिटेगी खुशहाली आएगी वगैरह -वगैरह, लेकिन सब कुछ इसके विपरीत ही हुआ है।

दिल बहलाने के लिए भले ही इस बात को भी मान लिया जाए कि हम विश्वगुरु बनने का आधा सफर तय कर चुके हैं, लेकिन इस समय हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका और पाकिस्तान के जो हालात हैं, उससे हम भी अछूते नहीं हैं। दोनों ही पड़ोसी देशों की जनता बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त है और सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए सड़कों पर उतर रही है। बेरोजगारी और महंगाई तो हमारे यहां भी हैं, लेकिन मंदिर मस्जिद और जाति धर्म के आगे ये समस्याएं बहुत ही बौनी नजर आती हैं। रुपए का कमजोर होना और डॉलर में ऐतिहासिक वृद्धि होना, भारत की खराब आर्थिक नीतियों को बयां करती हैं। 

देश के समाचार पत्र और न्यूज चैनलों ने आप तक ये महत्वपूर्ण जानकरियां अच्छी तरह से पहुंचा ही दी होंगी कि उज्जैन रेलवे स्टेशन से महाकाल लोक मंदिर कितने किलोमीटर दूर है ? या अगर आप बस से जाओगे तो कितना किलोमीटर दूर पड़ेगा ? किस शहर से कितने किलोमीटर दूर है महाकाल लोक मंदिर ? कितने वर्ग में फैला हुआ है ? मंदिर में कौन सी मूर्ति लगी हुई हैं ? मंदिर की लंबाई चौड़ाई क्या है ? भारतीय मीडिया ने आपको यह जरूर बताया होगा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 856 करोड़ रुपए की " महाकाल गलियारा परियोजना " देश के विकास के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने महाकाल लोक परियोजना के जिस पहले चरण का उद्घाटन किया है, उसकी लागत 351 करोड़ रुपए है।

बीते आठ वर्षों यानि कि साल 2014 से अब तक प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने कई धार्मिक स्थानों का कायाकल्प हुआ है, जिनमें कोरोनाकाल में 800 करोड़ रूपए से निर्मित काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन में 856 करोड़ रूपए की लागत से निर्माधीन महाकाल लोक कॉरिडोर, राम मंदिर, श्री कालिका माता मंदिर, निर्माणाधीन तुकाराम शिला मंदिर, जिसकी प्रस्तावित राशि 11000 अर्थात ( ग्यारह हजार करोड़ रूपए) है, केदारनाथ धाम का कायाकल्प, केदारनाथ बद्रीनाथ की यमुनोत्री और गंगोत्री के चारधाम परियोजना आदि ऐसी कई धार्मिक योजनाएं हैं जिन पर मोदी सरकार अंधाधुंध पैसा बहा रही है। आप खुद ही सोचिए जिन लाखों करोड़ रुपयों का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों का निर्माण और कायाकल्प करने में बहाया जा रहा है, यदि उन पैसों को वास्तविक जीवन में उत्पन्न समस्याओं को खत्म करने के लिए किया जाए, तो देश और समाज की बदहाल स्थिति में काफी सुधार आ सकता है। लेकिन इस देश की राजनीति और यहां के राजनेता कभी भी भारत की जनता को जाति और धर्म की लड़ाई से बाहर नहीं आने देंगे!

जब तक हम खुद ही सामाजिक समस्याओं को राजनीतिक चश्मे से देखते रहेंगे, तब तक इसी प्रकार से राजनीतिक शोषण और अवहेलनाओं का शिकार होते रहेंगे।

मस्जिदों को तोड़कर मंदिरों का निर्माण करने को विकास नहीं कहते और ना ही इस तरह से विश्वगुरु बन सकते हो!

सखी सईयां तोह खूब ही कमात है,
मेहंगाई डायन खाए जात है।


लेखक- नितिन कुमार शुक्ला (सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार )

Disclaimer : ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है। इस लेख के लिए किसी भी प्रकार से Guna Samachar उत्तरदायी नहीं है।

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